सरकार और विभाग भले ही लाखो दावे करते ना थक रहा हो लेकिन प्राइवेट स्कूलो की लूट खुल्ले आम लगातार जारी है पहले किताब के नाम पर फिर ड्रेस के नाम पर अब सर्दियो की ड्रेस के नाम से बेहिसाब लूट चल रही है जो ट्रेक सूट आम दुकान पर एक हजार के आस पास मिल जाता है वो भी बडे साईज का वही ट्रेक सूट इन दुकानो पर ढाई से तीन हजार का मिल रहा है वही स्कूल का कोट वो भी ढाई से तीन हजार से कम नही मिल रहा जब इस बारे मे स्कूल प्रबंधन से बात करते है तो उनका साफ तौर से कहना होता है कि ये सब आप जानो या दुकानदार और जब दुकानदार से इस लूट के बारे मे पूछो तो दबी जुबान मे नाम ना बताने की शर्त पर कहते है कि साहब हमे तो बस मट्ठा ही मिलता है मलाई और घी तो स्कूल वाले खा जाते है दुकानदारो की माने तो मुनाफे मे से चालीस प्रतिशत दुकानदार का और साठ प्रतिशत स्कूल का कमीशन तय होता है भले ही सरकार ने किताबे और ड्रेस स्कूल मे बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया हो पर मनमानी अभी भी उनकी ही चल रही है यही वजह होती है किसी कीसी भी स्कूल मे बच्चे भले ही दस हजार क्यो ना हो मगर उसकी किताबे और ड्रेस बस आपको एक ही दुकान पर मिलेगी बस इसी वजह से अभिभावक मजबूर होकर उसी चिन्हित दुकान से किताबे और ड्रेस खरीदने को मजबूर होते है, यहा एक दिलचस्प बात और है कि अभिभावक दुकानदार से तो बहस भी कर लेते है लेकिन स्कूल प्रबंधन से अगर दबी जुबान मे भी कुछ बोलदेते है तो उसका खामियाज़ा बच्चो को स्कूल मे भुगतान पडता है यही वजह है कि बच्चो के माता पिता इस लूटपाट को चुपचाप सहन करने को मजबूर है
इस खबर को लिखने का कारण हमारे ऐक जागरूक पाठक का वाट्सऐप मैसेज रहा जो इस तरह से है ÷
*दोस्तों कल मैंने पलटन बाजार में स्कूल ड्रेस बेचने वालों की दुकानों पर भीड़ और लाइन लगी देखी , सिर्फ चुनिंदा दुकानों पर, भयंकर बिजनेस, और बाकी दुकानदार टुकुर-टुकुर ताक रहे थे क्यों? क्योंकि स्कूलों से सिर्फ इन्हीं दुकानों की सेटिंग थी, मां-बाप कलप रहे थे , लेकिन, सब खुश थे क्योंकि सब ( लुट ) रहे थे अंधा क्या चाहे दुनिया अंधी हो जाए इसमें बड़े-बड़े तुर्रम खान भी थे पर भीगी बिल्ली बने हुए क्योंकि किसी की हिम्मत नहीं जो स्कूलों के खिलाफ आवाज उठा सके क्योंकि बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा भी तो कौन😢😨🤔 एक सुनियोजित शोषण के खिलाफ सुप्रभात के साथ आपका दोस्त सागर🙏🙏*

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