March 21, 2026

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राजधानी मे भू माफियाओ की जडे पहुंची पाताल तक ,बडे मगरमच्छो से डर कर पुलिस और प्रशासन छोटी मछलियो का कर रहा शिकार,आखिर किसके इशारे पर चल रहा पुलिस का बडा खेला।

देहरादून। आज अदालतों में झूठे सच्चे मुकदमों के अम्बार और पुलिस की एकाउंटबिलटी न होने से न जाने कितने बेगुनाहों की जिन्दगी अदालतों के चक्कर काटते काटते खत्म हो रही है या फिर जेल में विचाराधीन कैदी के रूप में पड़े रह कर दसियों साल तक जीवन की बर्वादी झेल रहे है? कहीं कोई इस भयावह खेल खेलने वाली पुलिस व अभियोजन की एकाउंटबिलटी है?
क्या इसके बारे में कहीं किसी सरकार या जुडीशियरी ने कोई परवाह की, दिखाई तो नहीं पड़ रही है परिणाम स्वरूप भ्रष्टाचारी काकस मौके का भरपूर लाभ उठा कर वेखौफ अनुचित लाभ उठा रहा है! इस काकस में प्रजातंत्र के तीनों महत्वपूर्ण स्तम्भ व भोंपू मीडिया एवं ठेकेदार जन नेताओं का भी तथाकथित रूप से कहीं न कहीं प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष एक चेन बनाकर गुल खिलाना सम्मिलित नजर आ रहा है जिसे वर्तमान में जन-जन की जुबाँ पर सुना जा सकता है! कोई कहता है जिसकी लाठी, भैंस उसी की और कोई कहता है गूंगी बहरी सरकार है और कोई तो न्यायपालिका की अनसुनी से निराश व नरवश होकर समरथ को नहीं दोष गुसाईं मानकर ऊपर वाले पर छोड़ बैठता है। वैसे भी तो न तो न्याय ही सस्ता और न ही सरकार तक पहुचना आसान?
सबका साथ, सबका विश्वास के स्लोगन को धूल चटाते छुटभैय्ये भाजपाई!

…जबकि एफआईआर तो इस तलवार व उसके साथियों के विरुद्ध दर्ज होनी चाहिए थी?

उदाहरण राजधानी दून का ही देखिए जहाँ जिसके विरुद्ध होनी चाहिए थी एफआईआर और कार्यवाही वहाँ उसे बचाने के लिए एक छोटे कार्यकर्ता व जनहित में राज्य सरकार की भूमि बचाने वाले को ही बिना पहिये के चक्रब्यूह में फँसा डाला गया।

उक्त मामला सहस्त्रधारा रोड की चर्चित और सर्वोच्च न्यायालय से प्रतिबंधित गोल्डन फारेस्ट व उसकी सहयोगी कम्पनियों की जमीन की है। जबकि उक्त तहसील सदर के ग्राम धनौला की जमीन के विरुद्ध सरकार द्वारा गठित एसआईटी (विशेष जाँच दल) हाई पावर कमेटी की रिपोर्ट में देहरादून के सहायक महा निबंधक ( निबंधन) को तीन माह पूर्व ही 12 अप्रैल, 2024 ही एफआईआर दर्ज कराने व कार्यवाही हेतु निर्देशित किया जा चुका था।
में अटकी वाली कहावत के अनुसार आरटीआई में मांगी गयी जानकारी से पता चला किएआईजी (रजि.) के कार्यालय, कलक्ट्रेट से चंद कदमों की.दूरी पर स्थित वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के कार्यालय तक एफआईआर दर्ज करने के लिए SSP तक पंहुचने में ढाई से तीन माह लग गये तथा उक्त 28 जून के हस्ताक्षर वाली चिठ्ठी विगत 2 जुलाई को SSP कार्यालय पंहुच गयी थी। और तभी से अब उक्त एफआईआर थाना राजपुर दर्ज न करके पुलिस के “पिक एण्ड चूज” के फार्मूले के अनुसार दमखम वाले इन राजनैतिक रसूखदार भू माफियाओं के विरुद्ध जिस प्रकार से सहानुभूति वाला रवैया अपना कर लटकाए रखा हैउससे अपने आप पर ही प्रश्न (?) चिन्ह लगवा रही है जिसे देख कर तो ऐसा लगता है कि वास्तव में धाकड़ धामी व धाकड़ एसएसपी भी इन धाकड़ भूमाफियाओं के आगे बौने हैं..?
यह भी ज्ञात हुआ है उक्त एफआईआर सम्बंधी उक्त मामला थाना राजपुर से आईटी पार्क चौकी भेजा गया था 15 जुलाई को उक्त शिकायत के शिकायतकर्ता से चौकी इंचार्जके द्वारा सम्बंधित प्रकरण के दस्तावेजों की छाया प्रतिया जांच में सहयोग के लिए चाही गयीं थीं जो शिकायतकर्ता के द्वारा दिनांक 18 जुलाई को ही लगभग 60-65 पन्नों में उपलब्ध कराईं जा चुकी हैं औरतत्पश्चात थाना राजपुर एसएस आई के द्वारा दिनांक 22जुलाई,2024 को थाना राजपुर बुलाकर एसआईटी को भेजी गयी उक्त शिकायत की प्रति पर काउंटर साईन भी यह कह कर करा लिए गये कि आज ही एफआईआर दर्ज कर अभियुक्तों के विरुद्ध कार्यवाही करेगी परंतु ऐसा लग रहा थाना राजपुर उक् प्रकरण को धूल फकवाने के लिए सजोये जाने की तैयारी में है। वहीं इसके ठीक उलट यही थाना राजपुर पुलिस है जिसने सरासर आनन-फानन में वेगुनाहों पर एक तरफा मनचाही कार्यवाही करते हुए मु0अ0 संख्या -141 /2024 दर्ज करने मे तनिक भी देर नहीं लगाई थी, क्या यह पुलिस का दोहरा रवैया नहीं है?
देखना यहां गौर तलव होगा कि धाकड़ धामी की धाकड़ पुलिस दोषी भूमाफियाओं जो भाजपा की चादर ओढ़े हैं के विरुद्ध एक्शन लेती है या फिर इन्हें…..?

क्या भाजपा ऐसे भेड़ियों को बाहर का रास्ता दिखायेगी?

वैसे.यहाँ यह तथ्य भी जनहित में उजागर करना है कि यह चुनिंदा लोगो का संगठित गिरोह गोल्डन फारेस्ट की अनेकों अनेक जमीनों की बहती गंगा में सुनियोजित षडयंत्र के तहत फर्जीवाड़ा करके भोले भाले लोंगो को ठगने में काफी समय से लगे हुए हैं । बताया तो यह भी जा रहा है कि इस संगठित गिरोह के सदस्यों पर कुछ आलाअफसरों सहित राजनैतिक नेताओं का संरक्षण बरकरार है जिससे भाजपा की छवि भी खासी.धूमिल हो रही है! भाजपा संगठंन में होने के कारण इनके आगे राजस्व विभाग सहित जिला प्रशासन व पुलिस प्रशासन भी अपने को बौना मान निष्क्रिय हो गया है

उत्तराखंड

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