
उतराखंड की राजधानी देहरादून से मात्र 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित द्रोणाचार्य जी की तपो भूमी के नाम से प्रसिद्ध स्थान सहस्त्रधारा पिछले करीब 38 सालों से महाराज दर्शन दास के डेरे की वजह से भी देश विदेश मे अपनी पहचान बनाने मे कामयाब हुआ है 80 के दशक मे जिला मुरादाबाद से आकर एक संत फकीर दास पतराम ने सहत्रधारा की बल्दी नदी के किनारे महाराज दर्शन दास के नाम की एक छोटी की कुटिया बना कर महाराज जी के द्वारा दिये गये नाम का जाप करना शुरू किया था

दास पतराम जी अपना भरा पूरा परिवार छोड़कर कर इस दुनिया के जीवो के कष्ट दूर करने के लिए इसी कुटिया मे बैठकर सतसंग के माध्यम से स्थानीय लोगो के दुखः दर्द का निवारण करने लगे समय के साथ-साथ डेरे की प्रसिद्धी दूर दूर तक पहुचने लगी तो कुटिया मे महाराज दर्शन दास जी का दरबार हर सोमवार को सजने लगा तो संगत के प्रयास से कुटिया को डेरे का रूप देने मे ज्यादा समय नही लगा 90 के दशक से डेरा प्रमुख महारानी पाली दर्शन दास जी ने साल मे दो बडे समागमो की शुरूआत कर दी जिसमे दूर दूर से संगत आने लगी लेकिन एक जुलाई सन 1999 को गुरू जी के नाम से जाने जाने वाले दास पतराम जी ने अपने प्राण त्याग दिये तो महारानी पाली दर्शन दास जी ने डेरे की जिम्मेदारी दास प्रेमचंद को सौप दी गौरतलब है कि डेरे मे दो बडे समागम एक जनवरी को डेरे का स्थापना दिवस और एक अप्रेल को रूहानी सत्संग का आयोजन लगातार चलता आ रहा है
इस बार भी एक अप्रेल को रूहानी सत्संग का आयोजन दास प्रेमचंद के सानिध्य मे दास बाबा गुरदीप सिह जालंधर वालो के श्री मुख से सत्संग सुन कर निहाल हुए दास गुरदीप ने यशवंती निराधार के हवाले से एक सुंदर उदहारण देकर नाम की महत्ता समझाई इस बार के समागम को बडे धूमधाम से मनाया आज के इस सत्संग मे दिल्ली उत्तरप्रदेश पंजाब हिमाचल और उतराखंड के कौने कौने से पहुंचकर लंगर छका जिसके बाद महाराज जी की यशवंती निराधार पर आधारित सत्संग की अमृत वाणी का श्रवण कर महाराज जी के बताये रास्ते पर चलने के संकल्प के साथ विदा ली इस समागम मे दास प्रेमचंद गुप्ता,दास पवन जी दास राजू,दास दास जगीर,सहित महाराज दर्शन दास के हजारो अनुयायी मौजूद रहे ।

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