
राजीव शास्त्री (राष्ट्रीय दिया समाचार) हरिद्वार
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ऋषिकेश सभागार में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने अंगदान पर विस्तृत जानकारी दी।
कार्यक्रम में दिल्ली एम्स के वरिष्ठ न्यूरो सर्जन डाॅ. दीपक गुप्ता ने बताया कि कोमा में चले जाने की स्थिति में व्यक्ति जीवित रहता है और ठीक भी हो सकता है, लेकिन ब्रेन डेथ एक मृत अवस्था होती है। ब्रेन डेथ अवस्था से व्यक्ति वापस जीवित नहीं हो सकता है। इसलिए यदि परिजन ऐसे व्यक्ति के अंगदान करवा दें तो यह न केवल पुण्य है, बल्कि इससे कई लोगों का जीवन भी बचाया जा सकता है।
अंगदान के मामले में हमारा देश 68वीं रैंक में है, जबकि सबसे पहले अपनी हड्डियों का दान करने वाले महर्षि दधीचि भारत भूमि पर ही जन्मे थे। उन्होंने कार्डियक डेथ और ब्रेन डेथ के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि देश में प्रति वर्ष डेढ़ लाख लोगों की सड़क दुर्घटना और 50 हजार से अधिक लोगों की मृत्यु धूम्रपान के कारणों से हो जाती है। यदि इस प्रकार के लोगों की मृत्यु होने से पहले इलाज करने वाले चिकित्सक ब्रेन डेथ स्थिति की जांच कर लें और परिजनों को अंगदान के प्रति जागरूक कर अंगदान करवा दें, तो प्रतिवर्ष देश के हजारों लोगों का जीवन बच सकता है।
बीते वर्ष इस प्रकार के मामलों में हुई 5 लाख मौतों में से केवल 1128 लोगों के परिजनों को ही अंगदान के प्रति प्रेरित किया जा सका। इसकी जागरूकता के लिए सामूहिक कदम उठाने होंगे।
संस्थान की कार्यकारी निदेशक प्रो. मीनू सिंह ने बताया कि एम्स में काॅर्निया बैंक स्थापित है और नेत्रदान करने वाले लोगों की वजह से संस्थान सैकड़ों अन्य जरूरतमंदों में काॅर्निया प्रत्यारोपित कर उनकी आंखों की रोशनी लौटा चुका है। उन्होंने जनता से अपील करते हुए कहा कि वो समाज में अंगदान के प्रति जन जागरूकता को बढ़ावा दें। कार्यक्रम में डीन एकेडेमिक प्रो. सौरभ वार्ष्णेय, मेयर शंभू पासवान आदि मौजूद रहे।

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