चन्द्र शेखर जोशी(मुख्य सेवक मां बगला मुखी एवं वरिष्ठ पत्रकार)
हिन्दू पंचांग के मुताबिक चैत्र मास की शुरुआत होती है, जिसकी संक्रांति को उत्तराखंड में फूलदेई पर्व के रूप में मनाया जाता है. 14 मार्च को संक्रांति को लोकपर्व फूल देईं पर्व है: चंद्रशेखर जोशी
इस दिन भगवान सूर्य कुंभ राशि को छोड़कर मीन राशि में प्रवेश करते हैं. बात 2024 की करें तो इस वर्ष यह त्यौहार 14 मार्च को मनाया जाएगा. इस दिन छोटी-छोटी बच्चियां घरों की देहली का पूजन फूलों से करती है. इस त्योहार को कुमाऊनी लोग “फूलदेही” जबकि गढ़वाली लोग “फुल संक्रांति” कहते हैं तथा फूल खेलने वाले बच्चो को फुलारी कहा जाता हैं.
बसंत ऋतु की स्वागत पर मनाई जाता है फूलदेही, प्रकृति का आभार व्यक्त करने का है प्रतीक: आपको इस त्योहार की कहानी सुनाते हैं
इसकी उत्पत्ति के बारे में पहाड़ों में अनेक लोककथाएं प्रचलित है. जिनके मुताबिक सदियों पहले जब पहाड़ों में घोघाजीत नामक राजा का शासन था. उसकी घोघा नाम की एक पुत्री थी. कहा जाता है कि घोघा (Ghogha) प्रकृति प्रेमी थी. परंतु एक दिन छोटी उम्र में ही घोघा कहीं लापता हो गई. जिसके बाद से राजा घोघाजीत काफी उदास रहने लगे. तभी कुलदेवी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि राजा गांवभर के बच्चों को वसंत चैत्र की अष्टमी पर बुलाएं और बच्चों से फ्योंली और बुरांस देहरी पर रखवाएं. जिससे घर में खुशहाली आएगी . कहा जाता है कि राजा ने ऐसा ही किया. जिसके बाद से ही पूरे राज्य में फूलदेई मनाया जाने वाला पर्व है।

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