
4 नवम्बर : कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को देव प्रबोधिनी: गढ़वाल मे इगास बग्वाल, कुमायु मे बुढी दीपावली
धार्मिक मान्यता के अनुसार
शंखासुर को मारने के बाद भगवान विष्णु बहुत थक गए। तब भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की एकादशी को क्षीर सागर में आकर सो गए। उन्होंने सृष्टि चलाने का काम भगवान शिव को सौंप दिया। फिर विष्णु कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को जागे। तब शिवजी सहित सभी देवी-देवताओं ने भगवान विष्णु की पूजा की और वापस उन्हें ये जिम्मेदारी सौंप दी।
4 नवंबर देव प्रबोधिनी एकादशी अबूझ मुहूर्त: चातुर्मास के चार महीने तक योगनिद्रा में रहने के बाद भगवान विष्णु इसी दिन जागते हैं। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में तीर्थ स्नान कर के शंख और घंटा बजाकर मंत्र बोलते हुए भगवान विष्णु को जगाते हैं। फिर उनकी पूजा करते हैं। शाम को गोधुलि वेला यानी सूर्यास्त के वक्त भगवान शालग्राम और तुलसी का विवाह करवाया जाता है। साथ ही घरों और मंदिरों में दीपदान करते हैं।
एकादशी पर मालव्य, शश, पर्वत, शंख और त्रिलोचन नाम के पांच राजयोग योग बन रहे हैं। साथ ही तुला राशि में चतुर्ग्रही योग बन रहा है। इस शुभ संयोग में देव प्रबोधिनी एकादशी की पूजा करने से अक्षय पुण्य दिवस है
उत्तराखंड के गढ़वाल में सदियों से दिवाली को बग्वाल के रूप में मनाया जाता है। कुमाऊं के क्षेत्र में इसे बूढ़ी दीपावली कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार आज ही के दिन तुलसी जी का विवाह शालिग्राम से हुवा था। जिन इलाकों में बूढ़ी दिवाली का त्यौहार मनाया जाता है, वहां सर्दियों में बेशुमार बर्फ पड़ती है और तापमान माइनस में चला जाता है। ऐसे में वहां बेहद मुश्किल हालातों में लोग रहते हैं और बर्फबारी के बाद आज भी उनका संपर्क बाकी दुनिया से काफी हद तक सीमित हो जाता है। माना जाता है कि इन जगहों पर भगवान राम के अयोध्या पहुंचने की खबर एक महीना देरी से मिली थी। पहाड़ी लोगों ने जब यह सुखद समाचार सुना तो उन्होंने देवदार और चीड़ की लकड़ियों की मशालें जलाकर रोशनी की और खूब नाच-गाना करके अपनी खुशी जाहिर की। तभी से यहां बूढ़ी दिवाली मनाने की परंपरा चल पड़ी।
4 Nov कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक आज ही भगवान विष्णु चार महीने की योग निद्रा से जागते हैं। इसलिए इसे देव उठनी एकादशी कहा जाता है। भगवान के जागने से सृष्टि में तमाम सकारात्मक शक्तियों का संचार बढ़ जाता है।
कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी पर तिल के तेल से दीपक लगाकर दान करने से कभी न खत्म होने वाला पुण्य मिलता है।
ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार इस दिन गढ़वाल के वीर भड़ ( वीर योद्धा ) माधो सिंह भंडारी ,तिब्बत विजय करके वापस गढ़वाल लौटे थे। उनके विजयोत्सव की ख़ुशी में यह पर्व मनाया जाता है। कहा जाता है ,कि मुख्य दीपवाली के दिन माधो सिंह भंडारी युद्ध में व्यस्त होने के कारण उनकी प्रजा ने भी दीपवाली नहीं मनाई ,जब वे विजय होकर वापस आये उसके बाद एकादशी के दिन सबने मिलकर विजयोत्सव मनाया।

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