September 21, 2026

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एआई से पहाड़ की बोली बचाने का भागीरथी प्रयास,सात लाख शब्दों का डेटा जुटाया गढ़वाली-कुमाऊंनी-जौनसारी को डिजिटल मंच देने की पहल, किताबों के साथ आवाज और बोलचाल का डेटा भी जुटाएगी संस्था.!

सुनील सोनकर (राष्ट्रीय दिया समाचार ) मसूरी

मसूरी। पहाड़ की लोकभाषाओं गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी को डिजिटल युग में संरक्षित करने की पहल शुरू की गई है। भाषा एआई की कोर टीम ने मसूरी में संवाद कर क्षेत्रीय भाषाओं को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक तकनीक से जोड़ने की योजना साझा की। टीम का कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर स्थान नहीं मिलने से आने वाली पीढ़ी इन भाषाओं के कई पारंपरिक शब्दों से दूर हो सकती है।

भाषा एआई-स्टडी इंजीनियरिंग फाउंडेशन के माध्यम से अब तक गढ़वाल, कुमाऊं और जौनसार से करीब सात लाख शब्द, वाक्य और उनके अर्थ जुटाए जा चुके हैं। टीम में सच्चिदानंद सेमवाल, अनिल गोदियाल और राजेंद्र सिंह रावत ने बताया कि वर्तमान में बड़ी मात्रा में भाषाई सामग्री किताबों और पांडुलिपियों में मौजूद है। इसे डिजिटल रूप देने के साथ लोगों की बोलचाल, उच्चारण और आवाज की रिकॉर्डिंग भी जुटाई जा रही है।

टीम ने लोगों से पुरानी किताबें, पांडुलिपियां, स्थानीय शब्दकोश, अर्थ सहित शब्दावली और क्षेत्रीय भाषाओं की ऑडियो रिकॉर्डिंग उपलब्ध कराने की अपील की। देहरादून में संस्था का कार्यालय बनाया गया है और परियोजना में तकनीकी विशेषज्ञों की मदद ली जा रही है। सरकार के साथ एमओयू की दिशा में भी बातचीत चल रही है।

सच्चिदानंद सेमवाल ने बताया कि अमेरिका और कनाडा में रहने वाले उत्तराखंड मूल के लोगों को भी अभियान से जोड़ा जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह केवल एआई मॉडल तैयार करने की पहल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास है। संस्था का लक्ष्य आने वाले एक-दो वर्षों में तैयार भाषाई डेटा को प्रमुख एआई और भाषा तकनीक के प्लेटफॉर्म तक पहुंचाना है।

सच्चिदानंद सेमवाल ने कहा कि गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी को बचाने के लिए सरकार के साथ-साथ समाज की भागीदारी भी जरूरी है। लेखकों, भाषा प्रेमियों, शिक्षकों, बुजुर्गों और आम लोगों से अपने पास उपलब्ध दुर्लभ भाषाई सामग्री साझा करने का आह्वान किया गया।

 

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