
उत्तराखंड बनने के बाद से जमीनो के भाव मे अप्रत्यक्ष रूप मे उछाल आने के बाद जमीन के मामलो मे होने वाले फर्जीवाडो की बाढ सी आई थी जिसके चलते अदालतो मे बेतहाशा रूप से लैंड फ्रॉड के मुकदमे आने लगे तो एसडीम डोईवाला शैलेन्द्र नेगी ने पिछले सालो मे दर्ज हुए मामलो के आधार पर गहन मंथन के बाद आम लोगो को इस जंजाज मे फंसने से बचाने के लिए भूमि क्रय करने वालो के लिए भूमी क्रय करने से पूर्व निम्नलिखित बिंदुओं का संज्ञान अवश्य लेने की अपील की है।
1- आवासीय उद्देश्य से क्रय की जाने वाली भूमि का विकास प्राधिकरण से स्वीकृत लेआउट की प्रति प्राप्त कर लें। बिना स्वीकृत लेआउट के भूमि क्रय करना अधिक जोखिम पूर्ण होता है।
2- क्रय की जाने वाली भूमि के अभिलेख यथा अद्यतन प्रमाणित खतौनी, खसरा, सजरा, 12 साला खतौनी, विक्रय पत्र/ दाननामा/ वसीयत/ विरासत आदि रिकॉर्ड संबंधित विक्रेता से प्राप्त कर लें । 12 साल का अभिलेख जरूर मांग लें तथा क्रय की जाने वाली भूमि की हिस्ट्री भी चेक कर ले। खतौनी को स्वयं भी पढ़ ले तथा उसमें समय-समय पर की गई प्रविष्टि के अनुसार संबंधित भूमि की स्थिति जान लें। क्रय की जाने वाली भूमि के आसपास के लोगों का पता लगाएं तथा उनसे भी बात कर लें ताकि सभी तथ्य आपके संज्ञान में रहे।
3- क्रय की जाने वाली भूमि के अभिलेखों को सत्यापित एवं परीक्षण करने के लिए तहसील के रजिस्ट्रार कानूनगो अनुभाग से अद्यतन प्रमाणित उद्धरण खतौनी की नकल प्राप्त कर लें । जिस दिन भूमि की रजिस्ट्री या बैनामा करना हो उस दिन की अद्यतन खतौनी अवश्य चेक कर लें ताकि उस दिन तक खतौनी में की गई समस्त प्रविष्ठियां आपके संज्ञान में आ जाएं।
4- लेखपाल से भूमि की प्रकृति , श्रेणी तथा विवादित या न्यायालय में विचाराधीन आदि के संबंध में अनिवार्य रूप से जानकारी ले ले ।
5- यह भी आवश्यक है कि भूमि क्रय करने से पूर्व न केवल भूमि संबंधी दस्तावेजों को भलीभांति देख लिया जाए बल्कि कब्जा संबंधी स्थिति भी स्पष्ट कर ली जाए। कई मौकों पर यह संज्ञान में आया है कि विक्रेता के नाम भूमि दर्ज है तथा उनके पास भूमि के अभिलेख भी उपलब्ध होते हैं लेकिन मौके पर उनका कब्जा नहीं होता है। जिस कारण क्रेता धोखे में आ जाता है और फिर जगह-जगह भटक कर अपना समय एवं धन को गंवा बैठता है।
6- भूमि को क्रय करने से पूर्व मौका जरूर देख लें और जिस भूमि को खरीद रहे हैं उसकी पूर्व की रजिस्ट्री व अन्य अभिलेखों के अनुसार स्वयं फीता डालकर लंबाई, चौड़ाई , क्षेत्रफल, सड़क की चौड़ाई , दिशाएं, प्रत्येक दिशा में अंकित भूमिधर या अन्य का विवरण आदि का सत्यापन स्वयं कर लें।
7- यह भी अपेक्षा है कि जो लोग घर बनाने के लिए भूमि खरीद रहे हैं, वह उस भूमि का भू उपयोग भी देख लें तथा इस संबंध में विकास प्राधिकरण से भू उपयोग की जानकारी प्राप्त कर ले ताकि मानचित्र स्वीकृत कराने में किसी प्रकार की कोई दिक्कत ना आए।
8- यह भी आवश्यक है कि विकास प्राधिकरण से उस भूमि पर कोई वाद दर्ज तो नहीं है, यह भी पता लगा लें क्योंकि यह भी संज्ञान में आया है कि विकास प्राधिकरण द्वारा अनेक खसरा नंबरों में अवैध प्लाटिंग के विरुद्ध चालान एवं ध्वस्त करने की कार्यवाही समय-समय पर की जाती है जिस कारण भविष्य में उनका मानचित्र स्वीकृत होने में कठिनाइयां आती है।
9- यह भी आवश्यक है कि भूमि की रजिस्ट्री करते समय दिए जाने वाले स्टांप की भलीभांति जांच कर ली जाए। यदि स्टांप कम लगाया जाता है तो ऐसी स्थिति में स्टांप एक्ट के अंतर्गत वाद योजित होने की संभावना बनी रहती है जिस कारण अनावश्यक न्यायिक कार्यवाही का व्यय भार संबंधित व्यक्ति पर पड़ता है।
10- यह भी आवश्यक है कि भूमि क्रय करने के पश्चात मौके पर तत्काल कब्जा जरूर ले लें । बाउंड्री वाल या तारवाड़ आदि कर अपने नाम का सूचना पट्ट आदि लगा ले ताकि कोई अन्य व्यक्ति धोखे या झांसे में फंस कर उस भूमि का क्रय, विक्रय, निर्माण, स्वरूप परिवर्तन आदि न कर सके।
11- क्रेता को चाहिए कि रजिस्ट्री होने के साथ ही क्रय की गई भूमि के दाखिल खारिज हेतु वाद न्यायालय तहसीलदार में योजित कर दें ताकि उनके नाम भूमि दर्ज हो सके।
12- भूमिधर या अधिकृत व्यक्ति से ही भूमि क्रय करें। दलालों से सावधान रहें।
13- भूमि क्रय करने से पूर्व रजिस्ट्रार कार्यालय से भूमि के भार मुक्त होने का प्रमाण पत्र प्राप्त कर लें।
14- किसी भी दशा में सार्वजनिक भूमि, राजकीय भूमि, वन, जंगल, झाड़ी, नदी आदि श्रेणी की भूमि को क्रय न करें। केवल संक्रमणीय अधिकार वाली श्रेणी की भूमि को क्रय करें।
15-पट्टे की भूमि को भी क्रय न करें।
16- श्रेणी 1 ग विशेष भूमिधर की भूमि को क्रय करने से पूर्व विक्रेता द्वारा क्रय करते समय प्राप्त अनुमति की शर्तों का अवश्य संज्ञान लें।
17- भूमि विक्रेता की जाति को विगत विक्रय पत्रों से जांच लें। ध्यान रहे कि अनुसूचित जाति के विक्रेता की भूमि को सामान्य जाति का व्यक्ति कलेक्टर की अनुमति से ही क्रय कर सकता है जबकि अनुसूचित जनजाति के विक्रेता की भूमि को केवल अनुसूचित जनजाति का व्यक्ति ही क्रय कर सकता है।
18- भूमि आबादी श्रेणी होने की स्थिति में विगत अभिलेख महत्वपूर्ण होते हैं। धारा 143 का आदेश हुआ हो तो आदेश का संज्ञान ले। विगत खतौनी तथा 12 साल का रिकॉर्ड अनिवार्य रूप से चेक कर ले। यदि 12 साल से अधिक समय से संबंधित भूमि आबादी घोषित हो चुकी हो तो उससे पूर्व का अभिलेख अवश्य देख लें।
सतर्कता में ही बचाव है।
शैलेंद्र सिंह नेगी उपजिलाधिकारी
डोईवाला

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